भारतवंशी वैज्ञानिकों ने स्पेस स्टेशन पर खोजे 3 बैक्टीरिया, ये मंगल ग्रह पर पौधे उगाने में मदद करेंगे
साइंस न्यूज़ भारतवंशी वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष स्टेशन पर खोजे 3 बैक्टीरिया, इन मंगल ग्रह पर पौधे उगाने में मदद करेंगेमंगल ग्रह पर इंसानों के बसने से पहले एक बड़ी चुनौती है फसल या पौधे उगाने की। ये चुनौती इंसानों के बसने या रुकने के बाद भी होगी। लेकिन आंतरिक अंतरिक्ष स्टेशन पर मौजूद वैज्ञानिकों ने ये काम आसान कर दिया है। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर मौजूद एस्ट्रोनॉट्स ने तीन ऐसे बैक्टीरिया खोजे हैं जो मंगल ग्रह पर फसल और पौधे उगाने में इंसानों की मदद करेंगे।
विल। अंतराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन) पर मौजूद वैज्ञानिक हमेशा पृथ्वी और अंतरिक्ष की तस्वीरें ही नहीं लेते हैं। बल्कि वहाँ पर कई अन्य तरह के प्रयोग भी चल रहे हैं। माइक्रोग्रैविटी और जीरो ग्रैविटी में पौधे कैसे उगे, इस पर भी अनुसंधान चल रहा है। ऐसी कठिन परिस्थितियों में पौधे या फसलें कितनी देर तक टिके, इसे लेकर काफी शोध चल रहा है। कई फसलें तो उगाई भी जा रही हैं। इसके लिए साइंटिस्ट बायोटेअ का उपयोग कर रहे हैं स्टेशन पर मौजूद वैज्ञानिक उसके अलग-अलग हिस्सों में पिछले छह सालों से पौधे उगा रहे हैं। मकसद है ऐसे सूक्ष्मजीवों की खोज करना जो फसलों और फसलों को उगाने में मदद करें। ये रिसर्च पिछले छह साल से चल रही है। आखिरकार स्पेस स्टेशन पर मौजूद साइंटिस्ट्स को बैक्टीरिया के चार अलग-अलग तरह के स्ट्रेन मिले हैं। इनमें से तीन ऐसे हैं जो मंगल ग्रह पर पौधे उगाने में मदद कर सकते हैं। इनमें से एक स्ट्रेन के बारे में तो पहले से पता था, लेकिन बाकी तीन एकदम नए हैं बैक्टीरियलिया के इन वैरिएंट्स को मिथाइलोबैक्टीरियासी (मिथाइलोबैक्टीरिया) कहते हैं। जो नए बैक्टीरिया स्ट्रेन खोजे गए हैं, वो लिन के आकार के हैं और ये चलफिर हो सकते हैं। जब इनकी जेनेटिक जांच की जाए। नितिन और डॉ। कस्तूरी की यह खोज साइंस जर्नल इंजन इन माइक्रोबॉयोलॉजी में प्रकाशित हुई है। इस टीम में भारत से हैदराबाद विश्वविद्यालय के साइंटिस्ट वीवी रामप्रसाद एडारा और भारतवंशी स्वातिजलानी भी हैं। स्वाति विश्वविद्यालय साउंडार्डन के साइंटिस्ट हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अगर यह बैक्टीरिया किसी तरह से कुछ बीजों के साथ मंगल ग्रह पर भिजवाएं जाते हैं तो वहां पर कुछ दिन में ही प्रयोग करके इनकी उपयोगिता की मूल जांच की जा सकती है। गया तो पता चला कि ये मिथाइलोबैक्टीरियम इंडिकम (मेथाइलोबैक्टीरियम इंडिकम) के निकटतम रिश्तेदार हैं। अंतरिक्ष स्टेशन पर मौजूद एस्ट्रोनॉट्स का मानना है कि ये तीनों वैरिएंट्स मंगल ग्रह पर पौधे उगाने में मददगार साबित हो सकते हैं। मैथिलोबैक्टीरियम प्रजाति के बैक्टीरिया मंगल जैसे ग्रहों पर पौधों उगाने में मदद कर सकते हैं। क्योंकि ये ऐसी सतहों पर जहाँ पानी कम होता है या न के बराबर होता है वहाँ सतह पर मौजूद एजेंटों को घोल बनाने में मदद करते हैं। जैसे ये बैक्टीरिया मॉलिक्यूलर नाइट्रोजन को अमोनिया में बदल देते हैं। या फिर अन्य नाइट्रोजन से संबंधित खादों की मिट्टी में बढ़ाते हैं। इस प्रक्रिया को नाइट्रोजन फिक्सेशन (नाइट्रोजन निर्धारण) कहते हैं। इतना ही नहीं, मिथाइलोबैक्टीरियम प्रजाति के बैक्टीरिया पौधों पर हमला करने वाले पैथोजेन्स को रोकने में भी मदद करते हैं। नासा के वैज्ञानिक डॉ। नितिन कुमार सिंह और डॉ। कस्तूरी वेंकटेश्वरन ने बताया कि ये बैक्टीरिया भविष्य में अंतरिक्ष में फसलें और पौधे उगाने में भारी मदद करने वाले हैं। कस्तूरी वेंकटेश्वरन ने कहा कि मिथाइलोबैक्टीरियम के तीनों जेनेटिक वैरिएंट्स की बुरी स्थिति और जलवायु में भी पौधे उगने में सक्षम हैं। न सिर्फ पौधे उगाने में बल्कि बुरे वातावरण में उन्हें बचाने में सक्षम हैं। इस समय हम दोनों वैज्ञानिक ये मांग कर रहे हैं कि स्पेस स्टेशन को थोड़ा और बड़ा किया जाए ताकि ऐसे प्रयोगों को बड़े पैमाने पर करके उनकी उपयोगिता की पुष्टि की जा सके। नितिन ने कहा कि स्पेस स्टेशन से बैक्टीरिया का सैंपल लेकर धरती पर आना। फिर उनकी जांच द्वारा वापस अंतरिक्ष स्टेशन पर ले जाना, ये काफी जटिल प्रक्रिया है। इससे बेहतर है कि वहाँ पर स्पेस स्टेशन को बड़ा करके प्रयोग किया जाए। वहाँ पर मॉलिक्यूलर टेक्नोलॉजीज का उपयोग किया जाए। इससे भविष्य की फसलें और पौधे तैयार करने में आसानी से हो जाएंगे। नितिन और डॉ। कस्तूरी की यह खोज साइंस जर्नल इंजन इन माइक्रोबॉयोलॉजी में प्रकाशित हुई है। इस टीम में हाय न सिर्फ पौधे उगाने में बल्कि बुरे वातावरण में उन्हें बचाने में सक्षम हैं। इस समय हम दोनों वैज्ञानिक ये मांग कर रहे हैं कि स्पेस स्टेशन को थोड़ा और बड़ा किया जाए ताकि ऐसे प्रयोगों को बड़े पैमाने पर करके उनकी उपयोगिता की पुष्टि की जा सके। नितिन ने कहा कि स्पेस स्टेशन से बैक्टीरिया का सैंपल लेकर धरती पर आना। फिर उनकी जांच द्वारा वापस अंतरिक्ष स्टेशन पर ले जाना, ये काफी जटिल प्रक्रिया है। इससे बेहतर है कि वहाँ पर स्पेस स्टेशन को बड़ा करके प्रयोग किया जाए। वहाँ पर मॉलिक्यूलर टेक्नोलॉजीज का उपयोग किया जाए। इससे भविष्य की फसलें और पौधे तैयार करने में आसानी से हो जाएंगे। नितिन और डॉ। कस्तूरी की यह खोज साइंस जर्नल इंजन इन माइक्रोबॉयोलॉजी में प्रकाशित हुई है। इस टीम में हाय न सिर्फ पौधे उगाने में बल्कि बुरे वातावरण में उन्हें बचाने में सक्षम हैं। इस समय हम दोनों वैज्ञानिक ये मांग कर रहे हैं कि स्पेस स्टेशन को थोड़ा और बड़ा किया जाए ताकि ऐसे प्रयोगों को बड़े पैमाने पर करके उनकी उपयोगिता की पुष्टि की जा सके। नितिन ने कहा कि स्पेस स्टेशन से बैक्टीरिया का सैंपल लेकर धरती पर आना। फिर उनकी जांच द्वारा वापस अंतरिक्ष स्टेशन पर ले जाना, ये काफी जटिल प्रक्रिया है। इससे बेहतर है कि वहाँ पर स्पेस स्टेशन को बड़ा करके प्रयोग किया जाए। वहाँ पर मॉलिक्यूलर टेक्नोलॉजीज का उपयोग किया जाए। इससे भविष्य की फसलें और पौधे तैयार करने में आसानी से हो जाएंगे। नितिन और डॉ। कस्तूरी की यह खोज साइंस जर्नल इंजन इन माइक्रोबॉयोलॉजी में प्रकाशित हुई है। इस टीम में हाय इस समय हम दोनों वैज्ञानिक ये मांग कर रहे हैं कि स्पेस स्टेशन को थोड़ा और बड़ा किया जाए ताकि ऐसे प्रयोगों को बड़े पैमाने पर करके उनकी उपयोगिता की पुष्टि की जा सके। नितिन ने कहा कि स्पेस स्टेशन से बैक्टीरिया का सैंपल लेकर धरती पर आना। फिर उनकी जांच द्वारा वापस अंतरिक्ष स्टेशन पर ले जाना, ये काफी जटिल प्रक्रिया है। इससे बेहतर है कि वहाँ पर स्पेस स्टेशन को बड़ा करके प्रयोग किया जाए। वहाँ पर मॉलिक्यूलर टेक्नोलॉजीज का उपयोग किया जाए। इससे भविष्य की फसलें और पौधे तैयार करने में आसानी से हो जाएंगे। नितिन और डॉ। कस्तूरी की यह खोज साइंस जर्नल इंजन इन माइक्रोबॉयोलॉजी में प्रकाशित हुई है। इस टीम में हाय इस समय हम दोनों वैज्ञानिक ये मांग कर रहे हैं कि स्पेस स्टेशन को थोड़ा और बड़ा किया जाए ताकि ऐसे प्रयोगों को बड़े पैमाने पर करके उनकी उपयोगिता की पुष्टि की जा सके। नितिन ने कहा कि स्पेस स्टेशन से बैक्टीरिया का सैंपल लेकर धरती पर आना। फिर उनकी जांच द्वारा वापस अंतरिक्ष स्टेशन पर ले जाना, ये काफी जटिल प्रक्रिया है। इससे बेहतर है कि वहाँ पर स्पेस स्टेशन को बड़ा करके प्रयोग किया जाए। वहाँ पर मॉलिक्यूलर टेक्नोलॉजीज का उपयोग किया जाए। इससे भविष्य की फसलें और पौधे तैयार करने में आसानी से हो जाएंगे। नितिन और डॉ। कस्तूरी की यह खोज साइंस जर्नल इंजन इन माइक्रोबॉयोलॉजी में प्रकाशित हुई है। इस टीम में हाय वहाँ पर मॉलिक्यूलर टेक्नोलॉजीज का उपयोग किया जाए। इससे भविष्य की फसलें और पौधे तैयार करने में आसानी से हो जाएंगे। नितिन और डॉ। कस्तूरी की यह खोज साइंस जर्नल इंजन इन माइक्रोबॉयोलॉजी में प्रकाशित हुई है। इस टीम में हाय वहाँ पर मॉलिक्यूलर टेक्नोलॉजीज का उपयोग किया जाए। इससे भविष्य की फसलें और पौधे तैयार करने में आसानी से हो जाएंगे। नितिन और डॉ। कस्तूरी की यह खोज साइंस जर्नल इंजन इन माइक्रोबॉयोलॉजी में प्रकाशित हुई है। इस टीम में हायभारत से हैदराबाद विश्वविद्यालय के साइंटिस्ट वीवी रामप्रसाद एडारा और भारतवंशी स्वाति बिजलानी भी हैं। स्वाति विश्वविद्यालय साउंडार्डन के साइंटिस्ट हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अगर यह बैक्टीरिया किसी तरह से कुछ बीजों के साथ मंगल ग्रह पर भिजवाएं जाएं तो व)


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